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सैय्यदिना_सिद्दीक़े_अकबर* *#का* *#शौक़े_दीदार*

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सैय्यदिना_सिद्दीक़े_अकबर*                           *#का*                    *#शौक़े_दीदार* मक्का मुअज़्ज़मा में इस्लाम का पहला तालीमी और तब्लीगी मरकज़ कोहे सफा के दामन में वाक़ेअ दारे अरक़म था.. उसी में हुज़ूर नबी ए करीम ﷺ अपने साथियों को इस्लाम की तालीमात से रोशनास फरमाते- अभी मुसलमानों की तादाद 39 तक पहुंची थी कि सैय्यदिना सिद्दीक़ अकबर رضی اللّٰہ عنہ ने इस ख्वाहिश का इज़हार किया कि:           "मैं चाहता हूं कि कुफ्फार के सामने दावते इस्लाम ऐलानिया पेश करूं-" आक़ा करीम ﷺ के मना फरमाने के बावजूद उन्होंने इसरार किया तो आप ﷺ ने इजाज़त मरहमत फरमा दी- सैय्यदिना सिद्दीक़ अकबर رضی اللّٰہ عنہ ने लोगों के दरमियान खड़े होकर खुत्बा देना शुरू किया जबकि रसूलुल्लाह ﷺ भी तशरीफ फरमा थे- पस आप ही वो पहले खतीब (दाई) थे जिन्होंने सबसे पहले अल्लाह तआला और उसके रसूल ﷺ की तरफ लोगों को बुलाया- इस बिना पर आपको इस्लाम का "खतीबे अव्वल" कहा जाता है-  नतीजत...

इस्लाम में दया और करुणा का महत्व

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इस्लाम एक ऐसा धर्म है जो दया और करुणा के महत्व पर बहुत जोर देता है। कुरान और हदीस में कई आयतें और कथन हैं जो मुसलमानों को दूसरों के प्रति दयालु और करुणामय होने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। कुरान में दया और करुणा कुरान में, अल्लाह को सबसे दयालु और सबसे करुणामय के रूप में वर्णित किया गया है। मुसलमानों को अल्लाह के इन गुणों का अनुकरण करने और दूसरों के प्रति दयालु और करुणामय होने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। कुरान में कई आयतें हैं जो दया और करुणा के महत्व पर जोर देती हैं। उदाहरण के लिए, सूरह अल-इंसान में, अल्लाह कहता है: "और वे भोजन की चाह होते हुए भी, निर्धन, अनाथ और बंदी को भोजन कराते हैं। (वे कहते हैं,) "हम तो तुम्हें केवल अल्लाह के लिए खिलाते हैं। न तुमसे कोई बदला चाहते हैं और न कृतज्ञता।" (76:8-9) यह आयत मुसलमानों को जरूरतमंदों की मदद करने के लिए प्रोत्साहित करती है, भले ही वे स्वयं जरूरतमंद हों। हदीस में दया और करुणा पैगंबर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने भी दया और करुणा के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा: "जो दूसरों पर दया नहीं कर...