हमारे फेसबुक पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें क़ुरबानी के बदले सदक़ह* ⭕आज का सवाल .⭕ अगर कोई क़ुरबानी न करे उसके बदले क़ीमत सदक़ह कर दे तो दुरुस्त है ? या क़ुरबानी ही ज़रूरी है ? 🔵जवाब🔵 حامدا و مصلیا و مسلما क़ुरबानी के दिनों में (क़ुरबानी वाजिब हो तो) क़ुरबानी ही ज़रूरी है क़ीमत का सदक़ह काफी नहीं , बाज़ों को जानवर लाने काटने और तक़सीम का बोझ पड़ता है, तो इन कामों पर भी बहुत अजरो सवाब दिया जाता है, अगर ये चीज़ न करनी हो तो छोटे जानवर की क़ीमत देकर उस की क़ुरबानी करने का किसी को भी वकील-ज़िम्मेदार बना सकते है, या बड़े जानवर में हिस्सा ले सकते है, लेकिन क़ुरबानी ही करनी पड़ेगी, उन पैसों से किसी की मदद करने से क़ुरबानी का वाजिब ज़िम्मे से न उतरेगा, और गुनेहगार होगा. हाँ अगर किसी वजह से उन दिनों में क़ुरबानी नहीं कर पाया और दिन गुज़र गए तो फिर क़ीमत का सदक़ह ज़रूरी है. फतावा महमूदिया जदीद १७/३१० से माखूज و الله اعلم بالصواب ✏मुफ़्ती इमरान इस्माइल मेमन 🕌उस्ताज़े दारुल उलूम रामपुरा, सूरत, गुजरात, इंडिया. हमारे Facebook पेज को लाइक करने के लिए क्लिक करें